डिजिटल जोर के बीच किताब वापसी
पिछले डेढ़ दशक में स्मार्ट क्लासरूम, टैबलेट और ऑनलाइन कंटेंट को आधुनिक शिक्षा का पर्याय मान लिया गया। यह विश्वास भी मजबूत हुआ कि डिजिटल माध्यमों से पढ़ने वाली पीढ़ी भविष्य की तकनीक-प्रधान दुनिया के लिए अधिक सक्षम होगी।
पिछले डेढ़ दशक में स्मार्ट क्लासरूम, टैबलेट और ऑनलाइन कंटेंट को आधुनिक शिक्षा का पर्याय मान लिया गया। यह विश्वास भी मजबूत हुआ कि डिजिटल माध्यमों से पढ़ने वाली पीढ़ी भविष्य की तकनीक-प्रधान दुनिया के लिए अधिक सक्षम होगी। पर अब इस धारणा पर दुनिया के कई देशों में पुनर्विचार हो रहा है। यह केवल सैद्धांतिक बहस नहीं, बल्कि अनुभवों और शोध अध्ययनों से उभरी चिंता का परिणाम है। अंतरराष्ट्रीय अध्ययन प्रोग्रेस इन इंटरनेशनल रीडिंग लिटरेसी स्टडी (PIRLS) के आंकड़ों में 2016 से 2021 के बीच स्वीडन के छात्रों की पठन क्षमता में गिरावट दर्ज की गई। हालांकि इस गिरावट के पीछे कई कारण माने जाते हैं, लेकिन इससे डिजिटल माध्यमों पर अत्यधिक निर्भरता को लेकर चिंताओं को भी बल मिला। शिक्षकों और अभिभावकों ने यह अनुभव साझा किया कि स्क्रीन पर पढ़ने वाले बच्चों का ध्यान अपेक्षाकृत जल्दी भटकता है और वे विषयों को गहराई से समझने में कठिनाई महसूस करते हैं। साथ ही, एक ही डिवाइस पर पढ़ाई और मनोरंजन की उपलब्धता ने भी एकाग्रता और सीखने की गुणवत्ता को लेकर नई चिंता पैदा की है।
दिलचस्प है कि जिन देशों ने डिजिटल शिक्षा को सबसे पहले और सबसे व्यापक रूप में अपनाया, वही अब इसके दुष्प्रभावों को समझते हुए संतुलन की ओर लौट रहे हैं। स्वीडन और फिनलैंड जैसे देश, जिन्हें शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी माना जाता है, अब फिर से किताब, कागज और कलम की अहमियत को पुनर्स्थापित करने में जुटे हैं। यह बदलाव अचानक नहीं आया। पिछले एक दशक में सामने आए शोध, क्लासरूम के अनुभव और सीखने के परिणामों ने नीति निर्माताओं को पुनर्विचार के लिए प्रेरित किया।
भारत के लिए ये अनुभव विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। यहां डिजिटल शिक्षा का न सिर्फ तेजी से विस्तार हो रहा है बल्कि इसे शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति माना जा रहा है। पर विकसित देशों के अनुभव ये संकेत दे रहे हैं कि अंधाधुंध डिजिटलीकरण के बजाय संतुलित दृष्टिकोण अपनाना ज्यादा जरूरी है। खासतौर पर भारत जैसे देश में, जहां बच्चों का स्क्रीन टाइम पहले से ही बढ़ रहा है, स्कूलों की भूमिका और भी अहम हो जाती है। सरकार और समाज दोनों को यह बात समझनी होगी कि स्कूल केवल तकनीक सिखाने का माध्यम नहीं, बल्कि सोचने, समझने और गहराई से सीखने की क्षमता विकसित करने का केंद्र होना चाहिए।
डिजिटल शिक्षा के शुरुआती दौर में इसके पक्ष में कई मजबूत तर्क दिए गए थे। मसलन, तकनीक से पढ़ाई को अधिक रोचक और इंटरैक्टिव बनाया जा सकता है, इंटरनेट के माध्यम से वैश्विक ज्ञान तक तत्काल पहुंच संभव है, और डिजिटल टूल्स के जरिए व्यक्तिगत सीखने की प्रक्रिया को बेहतर बनाया जा सकता है। इन्हीं तर्कों के आधार पर स्वीडन ने 2009 के आसपास स्कूलों में टैबलेट और कंप्यूटर को पाठ्यपुस्तकों के विकल्प के रूप में अपनाया, जबकि फिनलैंड ने छात्रों को लैपटॉप देकर डिजिटल लर्निंग को बढ़ावा दिया। भारत समेत दुनिया के कई देशों ने इस मॉडल को आदर्श मानते हुए तेजी से अपनाया। विशेष रूप से कोविड-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन शिक्षा ने अनिवार्य रूप ले लिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म शिक्षा की मुख्यधारा में आ गए। पर समय के साथ यह साफ होने लगा कि तकनीक का अतिरेक सीखने की गुणवत्ता पर असर डाल सकता है।
नॉर्वे और अमेरिका में हुए कई शोध बताते हैं कि जब बच्चे हाथ से लिखते हैं, तो उनके मस्तिष्क के कई हिस्से सक्रिय होते हैं, जिससे स्मृति और समझ दोनों मजबूत होती हैं। इसके उलट कीबोर्ड पर टाइपिंग अपेक्षाकृत यांत्रिक प्रक्रिया है, जिसमें गहराई से सोचने की प्रवृत्ति कम हो जाती है। यही कारण है कि हस्तलेखन की वापसी को अब केवल परंपरा नहीं, बल्कि वैज्ञानिक आवश्यकता के रूप में देखा जा रहा है। लगातार स्क्रीन के संपर्क में रहने से आंखों पर तनाव, नींद में बाधा और मानसिक अस्थिरता जैसी समस्याएं भी बढ़ रही हैं, जो बच्चों के समग्र विकास को प्रभावित करती हैं।
डिजिटल शिक्षा का एक और अनपेक्षित परिणाम स्क्रीन एडिक्शन के तौर पर सामने आया है। कम उम्र में डिजिटल उपकरणों के अत्यधिक उपयोग से बच्चे सूचनाओं को तेजी से ग्रहण तो कर रहे हैं, लेकिन उनका विश्लेषण करने की क्षमता कमजोर पड़ रही है। यही कारण है कि फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और नीदरलैंड्स जैसे देशों ने स्कूलों में मोबाइल फोन के उपयोग पर सख्ती शुरू की है। यह कदम अनुशासन से अधिक सीखने की गुणवत्ता को ध्यान में रखकर उठाया गया है। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण संकेत स्वीडन से मिला है, जहां सरकार ने फिर से मुद्रित पाठ्यपुस्तकों को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया है। शिक्षा मंत्री लोटा एडहोम ने स्पष्ट कहा है कि बच्चों के लिए फिजिकल बुक्स का महत्व अपरिहार्य है। यह निर्णय केवल संसाधनों के पुनर्वितरण का नहीं, बल्कि शिक्षा के मूल दर्शन की ओर लौटने का संकेत है।
यूनेस्को ने अपनी एक रिपोर्ट में साफ कहा है कि तकनीक शिक्षा का विकल्प नहीं, बल्कि उसका पूरक है। असल चुनौती यह है कि हम तकनीक का उपयोग इस तरह करें कि वह सीखने की प्रक्रिया को समृद्ध करे, न कि उसे सतही बना दे। यही कारण है कि अब हाइब्रिड लर्निंग मॉडल को भविष्य का रास्ता माना जा रहा है, जिसमें डिजिटल और पारंपरिक दोनों माध्यमों का संतुलित उपयोग हो। इसलिए डिजिटल युग में किताबों की वापसी किसी विफलता की कहानी नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया के परिपक्व होने के संकेत हैं। दुनिया ने तकनीक के साथ प्रयोग किया, उससे सीखा और अब संतुलन की ओर बढ़ रही है। भविष्य की कक्षा संभवतः ऐसी होगी जहां टैबलेट और किताब दोनों साथ होंगे, स्मार्टबोर्ड और ब्लैकबोर्ड एक-दूसरे के पूरक होंगे और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ शिक्षक की भूमिका और भी अहम हो जाएगी।